उड़ जाएगा हंस अकेला...: उबाऊ प्रार्थना

कौशलेंद्र प्रपन्न

स्कूलों में आज भी उबाऊ प्रार्थना जारी है। तकरीबन बीस साल पहले प्रो. कृष्ण कुमार जी ने स्कूली प्रार्थना का विश्लेषण शिक्षा समाज को दिया था। जो पढ़ना चाहें वे बच्चों की भाषाः अध्यापक निर्देशिका में पढ़ सकते हैं।

स्कूलों में प्रार्थना जिस बेरूखी और उबाऊ तरीके से होती है कि जिसे सुनकर लगता है इससे अच्छा न हो। यह बरताव न केवल प्रार्थना के साथ किया जाता है बल्कि राष्ट्र गान भी उसमें शामिल है। कभी कभी स्कूलों में होने वाले प्रार्थना और राष्ट्र गान को सुनता हूं तजो लगता है हमारे बच्चे और शिक्षक किस स्तर तक उच्चारण के जरिए अर्थ का अनर्थ करते हैं।

शिक्षक की भूमिका में भी इसमें साफ झलकती है। शिक्षक सामान्यतौर पर हाथ बांधे अनुशासनात्मक व्यवस्था संभालने में लगे होते हैं। उनका काम बच्चों पर निगरानी रखना होता है कि वे ठीक से खड़ें हैं या नहीं। प्रार्थना व राष्ट्र गान गा रहे हैं या नहीं।

राष्ट्र गान में आए शब्दों को यदि कभी बच्चों के मुख से सुनने का अवसर मिले तो जरूर समय निकाल कर सुनें। जो लोग सिनेमा हॉल जो कि शुद्ध मनोरंजन स्थल है वहां भी राष्ट्र गान में खड़े होने, गाने की पैरवी करते हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे स्वयं शुद्ध राष्ट्र गान करने में सक्षम हैं।

स्कूल जिम्मेदार नागरिक बनाने की पहली पाठशाला के तौर जानी जाती है। लेकिन वहां राष्ट्र गान और अन्य प्रार्थनाओं के साथ बच्चे रू ब रू होते हैं यह एक चिंतनीय विषय है। कायदे से प्रार्थना और राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ गाया जाना चाहिए। हालांकि कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि शुद्धतावादियों ने ही हिन्दी व अन्य भाषाओं को सबसे ज़्यादा हानि पहुंचाई है। लेकिन फिर भी कम से कम राष्ट्र गान को सही तरीके से गाने की वकालत को नकारा नहीं जा सकता। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या स्कूलों में सभी बच्चों को राष्ट्र गान की तालीम दी जाती है? थोड़ी देर के लिए मान लें विद्यालय के पास सभी बच्चों पर ध्यान देने का समय नहीं है तो क्या घर-परिवार के सदस्यों ने कभी राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ बच्चों को सुनाया या अभ्यास करने की कोशिश की है।

स्कूलों में बच्चे जो सुनते, पढ़ते,लिखते और बोलते हैं वो उनके साथ ताउम्र रहती है। यदि राष्ट्र गान व प्रार्थना ग़लत शैली व तर्ज़ पर बच्चों को मिली है तो उन्हें अतिरिक्त अभ्यास और प्रयास से ठीक करना पड़ता है।

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